छुपा हुआ एक सबक

जी हाँ, उसका नाम था पोंगा। आप ने सही सुना था। उसका नाम कितना अजीब था। सिर्फ उसका नाम भी अजीब नहीं था बल्कि उसकी आदते भी अजीब थी। और उसके साथ में खुदा ने उसको अजीब सी शकल का मालक भी बना दिए था। अगर कहानी यही पर ख़तम हो जाती तो बात कुछ को और हो सकती थी। सुना है कि जब वो सिर्फ छोटा सा बच्चा था तो उसकी माँ उसको छोड़ कर कहीं भाग गई थी। जाते हुए वो पोंगे के छोटे भाई को भी साथ लेती चली गई थी। कुछ तो ऐसा हुआ होगा कि माँ आपने बच्चे को छोड़ कर भाग गई थी। यह तो सिर्फ पोंगा का पिता जी ही बता सकते थे। पर उसने कभी आपनी पत्नी के खिलाफ एक भी शब्द बुरा भला नहीं कहा था।
पोंगा का पिता जी एक सुलझा हुआ इन्सान था। खुदा की रहमत से घर में कभी किसी तरह की कमी थी। पोंगा के पिता जी अक्सर कहा करते थे, “मेरा बेटे को तो कोई समझ नहीं है। अगर मुझे कुछ हो गए तो कौन उसकी देखपाल करेगा।” पहले तो लोग उसको इस बात से उसको सहारा देते थे, “अभी छोटा है। जब बड़ा होगा तो अपने आप समझ आ जाएगी।”
काश, ऐसा होता कि पोंगा को दुनियाँदारी की समझ आ जाती। फिर धीरे धीरे समह बढ़ता गया और पोंगा का बाप बुड़ा होता गया। पोंगा बड़ा तो हो गया लेकिन उसके मन का बच्चा कभी भी बड़ा नहीं हुआ। उसके बाप को अब फिक्र होने लगी कि खुदा का दिया हुआ तो बहुत कुछ है लेकिन एक दिन उनका नाम लेने वाला कोई नहीं रहेगा।” उसके पिता जी की इस बात का किसी पास कोई ज़वाब नहीं था। एक दिन आपने इस सवाल के ज़वाब से पोंगा का बाप इस दुनियाँ को अल्विदा कह गया। और जाते हुए छोड़ गया करोड़ों की सम्पति पोंगा के लिया।

जब तक पोंगा का बाप जिंदा रहा तब तक उसने अपने बेटे को लालची रिश्तेदारों से बचा कर रखा था। लेकिन उसके मरते ही वो ऐसे बाहर निकले जैसे मधुमक्खियों आपने भंडारे से निकल आती है। गांव के लोगों ने उसके पिता जी के अहसानों को चुकाने के लिया पोंगा की सहयता करने की नाकमजाब कोशिश की क्यूंकि कानून ने उनका साथ नहीं दिया। पोंगा ने भी अब गाँव के लोगो से बात करना छोड़ दिया था। दो चार सालों में रिश्तेदार पोंगा की ज़मीन और घर बेच कर भाग गये और पोंगा के पास ना तो खाने लिया था ना ही रहने के लिया कोई घर था। गाँव के लोगों ने पोंगा को गले लगा लिया।
जैसा भी था वो बात अलग थी पर पोंगा कभी किसी से मुफ्त में खाना लेकर नहीं खाता था। वो सब के छोटे मोटे काम कर दिया करता था। कभी पोंगा किसी के खेत में काम देता जा फ़िर किसी के बच्चे को स्कूल में खाना देने चला जाता। वक़्त ऐसे ही गुजरने लगा। अब अक्सर लोग बातें करते कि कभी पोंगा के बाप दादा का नाम हुआ करता था। अगर पोंगा को कुछ हो गया था उनका तो नाम निशान ही ख़तम हो जाएगा। सभी का अपना अपना दिमाग होता है फिर उनकी बातें भी तो उन की हुई ना। कोई कहता पोंगा तो एकला इन्सान है। अगर आज मर गया तो चार लोग उसकी अर्थी को कन्धा देने को भी नहीं आएंगे।

फिर वो दिन भी आ गया जब पोंगा भी अपने पिताजी के पास चला गया। सुना नहीं बल्कि देखा है कि पोंगा के जनाज़े के पीछे हजारों की भीड़ थी। कोई बूढ़ा और बच्चा ऐसा नहीं था जो पोंगा के जनाज़े और अंतिम अरदास में शामिल न हुआ हो। पोंगा को गुज़रे हुए आज तीस साल हो चुके है। अगर उसकी शादी होती तो हो सकता था कि उसकी औलाद के भी आगे औलाद होती। लेकिन लोगों की यह बात सही नहीं है कि पोंगा या फिर उसके पिताजी का कोई नामो निशान नहीं है। क्योकि पोंगा मन का अच्छा और दिल का साफ़ एक मेहनती इन्सान था। आज तीस साल बाद भी पोंगा को लोग याद करते है। उसकी भोली भाली बातों को याद करके खुश होते है। बड़े आपने छोटे बच्चों को उसकी बातें सुनाते है। ऐसा नहीं के वो अपने बच्चों का मन मनोरंजन करने के लिए उसकी कहानी सुनाते है बल्कि उसमें छुपे हुए उस सबक को पढ़ाना चाहते हैं जो सिर्फ एक इन्सान को सही मार्ग पर जाने की और संकेत करता है।
पोंगा की जिन्दगी इन्सानियत की एक मसाल है। ना तो चेहरे की खूबसूरती ना ही अमीरी इन्सान के वज़ूद को जिन्दा रखती है। मेहनत और ईमानदारी को मौत भी नहीं ख़तम कर सकती। खानदानों का नाम औलाद से नहीं आप के अच्छे कर्म से जिन्दा रहता है।आप का मन साफ़ नहीं और नीयत खोट से भरी हुई है तो आपना जिस्म साफ़ करना और पूजा पाठ सब बेकार है।

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