She does not have words

अपने आप में मस्त वो अपने कज़न बीनू के साथ खेल रही थी। अचानक पड़ोस में रहने वाली भाभी ने उसको आवाज़ लगाई, “मुन्ना, यहां आओ. तुमसे कोई बात करनी है। “
मुन्ना को यह बात कभी भी पसन्द नहीं थी कि कोई उसकी खेल में बाधा डाले। पर माँ का हुकुम था कि कभी भी अपने से बड़े का नरादर नहीं करते। इसलिए उसको पड़ोसन भाभी की बात सुननी पड़ी।
भाभी के पास पहुँच कर उसने पूछा ,”यह भी कोई बात हुई। हम लोग खेल रहे थे और आप ने बाधा डालना ही था। ऐसी क्या बात है यो आप बाद में नहीं बता सकती।”
ना चाहते हुए भी बिनु और मुन्ना पड़ोसन भाभी के पास बैठ गए। भाभी मुहल्ले में मन गड़त बनाने में माहिर मानी जाती थी।
भाभी बोली,”सुनो, तुम दोनों अपना वक़त उस मुस्लिम सैनिक के साथ बतीत करते हो। यह मुस्लिम लोगों का कभी भरोसा नहीं करना चहिया। “
बीनू खामोशी के साथ भाभी की बात सुनता रहा। लेकिन मुन्ना की ज़बान को लग़ाम देना इतना आसान नहीं था।
मुन्ना ने भाभी को उसी वक़त ज़वाब दिया,” भाभी जी, आप को अब्दुल इस लिए नहीं पसन्द क्यूँकि वो आप के बेटे को गरिफ्तार कर चूका है। वो मुस्लिम है पर सच्च के रास्ते चलना वाला इन्सान है। इस का मतलब मेरा बाबा भी अच्छा नहीं है क्यूँकि वो भी मुस्लिम है। “
मुन्ना ने घूम के बीनू की तरफ देखा और उसको बोली,” चलो। घर चलते है। अब हम इसके पास कभी भी खेलने नहीं आएंगे। “
भाभी पीछे से बोली,” लोग सच्च ही कहते है कि तेरी शकल ही नहीं बल्कि अकल भी अपने बाप पे गई है। माँ पर गई होती तो शायद तेरे भेजे में मेरी बात पड़ जाती।”
मुन्ना को सुनाई तो दिए पर वो अपने गुस्से को काबू करने में कामजाब रही। उसके बाद वो कभी उनके घर में खेलने नहीं गई। बीनू और मुन्ना दोनों उसके घर खेलने जाते थे क्यूँकि भाभी घर में अकेली रहती थी। उसका पति यूनिवर्सिटी में काम करता था। बड़ा बेटा विदेश में था। छोटे बेटे को अबू ने अन्तिकवादी करवाई की वजह से गरिफ्तार कर रखा था। भाभी घर अकेली रह गईं थी इसलिए मुन्ना ते बीनू उसके पास चले जाते थे। उस बात के बाद उन दोनों ने जाना बंद कर दिए था।
कुछ अरसा बीत गया। मुन्ना अब एक बच्ची नहीं रही थी। अब्दुल के साथ उसका वक़्त बिताना अब उसकी माँ को भी अच्छा नहीं लगता था। माँ एक दिन कहती, “मुन्ना, कभी किसी मुस्लिम पर भरोसा मत करना। यह कभी किसी के मित नहीं हुआ करते। ये मतलबी इन्सान है और मतलब पूरा होते हुए भाग जाते है।”
मुन्ना ने कहा,” तो फिर आप मेरे बाबा पर कैसे विश्वाश करते हो। ‘
माँ बोली,” क्यूँकि तुम्हारा बाप सरदार पैदा हुआ था। शेर पैदा हुआ था बकरी की खाल पहन कर बकरी नहीं बन गया। “
लेकिन अब्दुल ने माँ की बात को नाकारा कर दिया। उसने अपने खान होने और एक अच्छा मुस्लिम होने का साबूत दे दिए। अपनी जान पर खेल कर उसने मुन्ना की इज्जत और जान दोनों को बचाया। जब माँ की बात समझ में आई। अब्दुल तो अपने खुदा की हिफ़ाजत में चला गया था।
इतने सालों बाद मुन्ना की रूह के हिस्से और उसके प्यारेअज़ीज ने भाभी और माँ के अल्फ़ाज़ों को सबूत में बदल दिया। मौलाना जी ने भी सच्च कह दिए कि मुन्ना तुम्हारी अम्मी ने ठीक ही कहा था।
मुन्ना के बच्पन के दोस्त ने तो बिना किसी झिझक से कह दिया, “अगर इतना प्यार किसी सरदार से किया होता। वो डर कर नहीं भागता बल्कि जख्मी होते हुए भी तुम्हारे साथ जंगे इ मैदान में तुम्हारा साथ देता। वो छुपने की बजाय तुम्हारे साथ किये हुए वायदों को पूरा करता चाहे उसकी जान क्यों नहीं जाती। “
इस वार मुन्ना के पास कोई ज़वाब नहीं था। क्यूंकि उसके बब्बी ने अब्दुल को कर फेल दिया और मुन्ना की माँ को विजेता बना दिया। मुन्ना को हराने वाला कोई और नहीं बल्कि उसकी अपनी ही रूह का वो हिस्सा है जिसको वो बेपनाह मुहाबत करती है।

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s