एक जानी सी अनजानी सी लड़की: जीवना

Photo by Daria Shevtsova on Pexels.com

कुछ लोग ऐसे होते है जिसका हमारे साथ कोई रिश्ता नाता और दोस्ती नहीं होती। पर फिर भी वो इन्सान हमारी जिंदगी में कुछ यादें और निशान छोड़ जाते है। इस रहस्य को तो सिर्फ खुदा ही जानता है कि क्यों यह अनजाने लोग दूसरों की जिन्दगी में एक अमिट छाप छोड़ जाते है। मेरी यह कहानी भी कुछ ऐसे ही है। सुना है कि माँ को जन्म देने के कुछ दिनों बाद मेरी नानी माँ इस दुनियाँ को अल्विदा कह गई थी। मेरी माँ ने अपनी माँ को नहीं देखा तो में कैसे देख पाती। इसलिए ना तो नानी और न ही दादी के प्यार का मेरे को कोई पता नहीं है। इस बात का मलाल ही रहेगा।

नाना अकेले कैसे चन्द दिनों की बच्ची को संभाल सकते थे। लेकिन दर्द की इस कड़ी में नाना की बहन उनका साथ दिया था। जानि मेरी माँ की देखवाल उसकी फूफी ने की थी। फूफी छोटी की बच्ची को लेकर अपने सुसराल चली गई थी। उसके अपने भी दो बेटे और दो बेटियां थी। लेकिन कहते है कि फूफी ने अपनी औलाद से अधिक अपने भाई की लड़की को मोह प्यार दिया था। उसी गाऊं में चार घर छोड़ कर मेरी फुफी रहती थी। इसलिए मेरे बाबा और माँ की पहली मुलाकात भी वही पर हुई थी।

माँ भी अपनी फूफी को बहुत प्यार करती थी।शादी होने के बाद भी अक्सर वो उसको मिलने जाया करती थी। ना चाहते हुए भी माँ के साथ मुझे भी जाना पड़ता था।माँ की फूफी बहुत अच्छी और नेक दिल की औरत थी। वो मुज़को भी बहुत प्यार करती है। मैं भी उसे फूफी कहा करती थी। गांव में रहने वाले फूफी के घर का माहौल मेरे घर से काफी अलग था। उनके पति बड़े जमींदार थे। फूफी के दिल की तरह उसका घर भी बहुत बड़ा था। घर के पीछे पालतू जानवरों के लिए एक शेड बना हुआ था, जो मेरी पसंदीदा जगह थी। एक दिन उन जानवरों से दोस्ती करते हुए में चारे का रैक पर चढ़ गई। मैंने अपनी नज़र को चारो तरफ़ घुमाया फिर एक जगह पर रुक गई। क्यूँकि दिवार की दूसरी तरफ मेरी ही आयु की लड़की नीम के दरख्त के नीचे बैठी हुई थी।

मैं एक कुख्यात और शरारती बच्चा था। मैंने उसकी तरफ घूर कर देखा। लेकिन उसने मुझे एक खूबसूरत मुस्कान के साथ देखा। नीम और शहतूत के नीचे बैठी उस लड़की का नाम था: जीवना। शायद उसका ध्यान मेरी तरफ नहीं था। वह कॉपी पर कुछ लिखने में व्यस्त थी। वह अपना समर स्कूल असाइनमेंट कर रही थी। उसने पारंपरिक पंजाबी पोशाक पहनी हुई थी।उसके काले लम्बे वालों को दो चोटिओं में कस कर बाँदा हुआ था। गर्मी बहुत अधिक थी और दोपहर का वक़्त था मुझे नहीं लगता था कि नीम और शहतूत का दरख्त मिल कर भी सूर्य की गर्मी से जीवणा को बचा रहे था। मैं देर तक उसको देखती रही थी पर वो मेरी तरफ देखने से कतरा रही थी। फिर यह सिलसला शरू हो गया। जब भी में फुफी को मिलने जाती तो दीवार के उस पार जीवना को देखने लिए में खुडली पर जरूर चढ़ कर उसको घूरती थी

एक वार उसने मुझे अपने हाथ के इशारे से अपने पास आने को कहा। उसके हाथ से इशारा करने का ढंग भी अजीब ही था। वो अपने हाथ को आधा मोड़ती थी और फिर अपनी बाजु को अपनी तरफ खींचती थी। पर में कभी उसके पास नहीं गई थी।
एक दिन फुफि ने मुझे परल का नेकलेस पहने को दिया। मेरा और जेवलरी का रिश्ता कुछ कम ही था। फुफि को जवाब देने का मतलब बाद में माँ का लम्हा चौड़ा भाषण सुनना पड़ता। इसलिए मैंने वो हार अपने गले में डाल लिया। फिर अपनी आदत के अनुसार में खुडली पर चढ़ कर जीवना की तरफ देखा। आंगन में जीवना अपने भाई और बहन के साथ खेल रही थी। खेलते हुए उसने मेरी तरफ देखा। अब मेरी वारी थी उसको अपने पास भुलाने की। मेरी आवाज़ सुन कर वो और उसके दोनों भाई बहन मेरी तरफ आये। मैंने अपना नेकलेस उतार कर उसको दे दिए। बिना कुछ कहे उसने नेकलेस मेरे से ले लिया। बाद में उसकी माँ ने मेरी फूफी को वो हार लौटा दिया था।

हम दोनों छोटी थी। हमारी भाषा अलग थी। हमारा रहन सहन अलग था। हमारा पहरावा अलग था। पर कुछ तो ऐसा था जो हम दोनों को एक साथ लाने की कोशिश कर रहा था। बाद में मुझे हॉस्टल पड़ने के लिए भेज दिया गया। इसलिए फूफी के घर जाना भी बंद हो गया था अब मेरी माँ अक्सर अकेले ही फूफी को मिलने जाती थी। इसके साथ मेरा जीवना से मिलने का अवसर भी चला गया था। कुछ अरसे बाद फूफी बीमार पड़ गई। मेरी माँ का एक पैर फूफी के यहां और दूसरा घर पर। माँ सुबह जाती और शाम को वापस आ जाती थी। ४० मिनट्स की ड्राइव थी। पर माँ के लिया फूफी ही उसकी माँ थी। एक दिन अर्जुन (driver) घर पर नहीं था तो चाचू ने मुझे माँ को लाने के लिया भेज दिया।

फूफी के घर पैर रखते मेरा ध्यान खुडली की तरफ गया। और फिर दीवार के उस पार। फूफी बहुत बीमार थी और चंद दिनों की मेहमान थी। मैं फूफी के साथ बैठी हुई था। अचानक एक लम्बी सी गोरी सी लड़की अपनी माँ के साथ कमरे में आई। लड़की का सिर पूरी तरह से ढका हुआ था और उसकी नज़र जमीन की तरफ थी। पर मैं उसको देख कर पहचान गई। यह तो जीवना थी। हम दोनों ने एक दूसरो को देख कर मुस्कराया। हमारी मुस्कराहट ही दुआ सलाम थी।

अभी कुछ पल ही गुज़रे थे कि तूफान की तरह मेरी खुद की फूफी भी पहुंच गई। वो बाहर खड़ी अपने भाई की जीप को पहचान कर भागी आई थी। शायद उसके मन में ग़ुस्सा था कि उसका भाई पहले उसे मिलने क्यों नहीं गया। मुज़को देख कर उसका ग़ुस्सा सातवे आसमान को पार कर गया। मेरी फूफी ने मेरी तरफ देख कर कहा,” जीवना की तरफ देख। कैसे उसने कपड़े पहने हुए है। और अपने आप को देख। यह पैंट शर्ट भी क्या लड़किओं का पहरावा है। मेरे भाई ने तुझे बहुत आज़ादी दे रखी है। उप्पर से जीप हाथ में पकड़ा थी।” मेरी फूफी ने लम्बा चौड़ा अपना भाषण दिया था जिसको मैंने सुना ही नहीं था।
कुछ दिनों के बाद माँ की फूफी जान इस दुनिया को अलविदा कर गई। उसके साथ साथ मेरा जीवना के साथ का एक अज़ीब सा बन्दन भी टूट गया।
में अभी १०थ ग्रेड में थी जब मेरी फूफी ने बताया कि जीवना की शादी हो गई। उसका पति भी एक किरसान था।
जब मेरी माँ अपने आखरी सांस ले रही थी। तो फूफी की बेटी उसको मिलने आई थी। मैंने अचानक जीवना के बारे पुछा। मेरी मौसी ने बताया कि जीवना अपनी जिन्दगी में बहुत खुश है। और वो तीन बच्चों की माँ है। पर मेरे दिमाग तो अभी वी उसका बचपन का चेहरा था।

कुछ दिनों पहले मेरे चचेरे भाई ने फ़ोन यह बताने के लिया किया कि उसकी बड़ी बेटी की सगाई इंडिया में हो गई है। मुझे कुछ हैरानी हुई फिर दिमाग में आया कही यह लड़की को इंडिया शादी करने के लिया मजबूर तो नहीं कर रहा। इसलिए मैंने सीथे उससे पुछा। पर उसने कहा के उसकी बेटी की खवाइश है। अमेरिका में पैदा हुई और इंडियन कल्चर से कोसों दूर मेरी भतीजी ने कैसे शादी करने को कैसे स्वीकार कर लिया। बाद में पता चला दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और सिंगापुर हुई कांफ्रेंस में दोनों की मुलाकात हुई थी। खुदा का शुक्र के मेरे भाई की सोच बदल चुकी है। जब मैंने उससे पुछा कहाँ हुई है सगाई। वो जोरो से हॅसने लगा। बहुत मुश्किल से अपनी हसीं को रोक कर उसने कहा, “फुफी के गाऊँ में। मुन्ना, क्या तुम मेरे साथ चलो गी? ” अब हम दोनों के हसने की वारी थी। क्यूंकि हमारी पांच जनरेशन में एक लड़की की शादी उस गाऊँ में जरूर होती है।
बिना कुछ सोचे मैंने अप्पने भाई को कहा कि मैं शादी पर जरूर जावांगी। मेरे मन में सिर्फ एक बात और दिमाग में एक चेहरा अचानक घूम गया। वो चेहरा था जीवना का और मेरा मन कह रहा था शयद वो मायके आई हो। हमारी मुलाकात फिर से हो। शयद हमेशा की तरह हम दोनों एक दूसरे से बात न कर सके। पर कम से कम हम एक दूसरे को देख तो पायेगी।

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