About knocking at the wrong door

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She knocks on the door with both her hands and says, “Open the door. I need to come back home.”
A voice comes from inside, “This is not your house. So go back. Don’t bother us.”
The woman thinks for a moment, “What the hell are these people talking about? I was told that my people stay in this house. But they say that my house is somewhere else. My house is on the hill which people call Janat. If I remember well, then that is my graveyard now.”
The woman turns her head. Then she suddenly remembers the specific day. A voice has echoed in her ears, “If you love him, forget him forever. You know you will make him separate from his community and society. Do you want him to see him away from his community? Is this your love for him? Go back to your people.”
What could she do? Maybe nothing. A thought comes to her mind, “I have nothing left to lose. Let’s save the person whom I love a lot. Perhaps my so-called sister is right. I am not a Muslim. I should go back home. Where should I go back? Who is mine? where is my home?”
She thinks multiple times before knocking on the door. Mother had told her right that she can return home anytime. The door of the house will always remain open for you.
Then she suddenly remembers, “My mother had gone a long time ago. No one else can open the door of the house for me.”
This voice echoes in her ears, “Munna, you are an orphan. Why don’t you understand that this society salutes power and wealth? Do you remember what your mother had told you? She said that a person needs two necessary forces to fight with this society: power and money. I can only give you money but not manpower. So it would be best if you left this place forever.”
It came to her mind that her so-called sister had told her to go back to her people. But the doors of her people are also closed to her.
Suddenly a thought comes to her mind, “This world is mean. No one is mine here. This is a real kulyug”.
She goes towards the window and drops all the curtains. She does not understand whether she is hiding from her soul or the truth or other people. She also does not understand that she is afraid of the truth or herself.
She deleted all the information from the phone. “I am not a good person.”
Everyone salutes the sun ascending. There is no value in setting sun or sunken and dodged lamps. “
Her sad heart becomes more depressed, and the rains start pouring from his eyes. she does not know how deep this storm is. If she had known how deep the storm would have been, she would have alerted others, but she didn’t have any clue about these strong tornadoes.
You can only feel love, but particular words or gestures could not reveal the depth and sincerity of love.
Finally, she returns to her safe house again. She carefully closed the curtains well. Only she or Khuda know her pain well. She neither has a house nor a pier. Neither she has any religion nor her people. She only has her conscience. She still has a voice that loves speaking the truth. This is why she is still alive, and she has faith in Khuda that she will get justice one day. The day will come when the victory of truth will win, and devils will lose. There will be such a person in this world who will have the power to speak the truth along with keeping his spoken words.

She keeps on knocking at the door with full force. But it is not a matter of her strength; rather, it is the strength of the person who will open the door for her.

वो दरवाज़े को अपने दोनों हाथों से पीटते हुए कहती है,”दरवाज़ा खोलो , मुझे घर वापस आना है।” अन्दर से आवाज़ आती है,”यह आप का घर नहीं है। इसलिए वापस जाओ। हम को तंग मत करो।” औरत कुछ पलों के लिए सोचती है ,”यह लोग क्या बकवास कर रहे है।  मुझे तो यही कहा गया था कि मेरा घर और लोग वही रहते है। पर यह कहते है कि मेरा घर तो कही और है।  मेरा घर तो पहाड़ी के उप्पर है। जिसको लोग जनत  कहते है। अगर मुज़को अच्छी तरह से याद है वो तो मेरी कबर है।”

औरत अपने सिर को चारों तरफ़ घुमाती है। फिर उसको अचानक उस दिन की याद आती है। उसके कानो में एक आवाज़ गूंजती है ,”अगर उसको प्यार करती हो तो हमेशा के लिया उसको भूल जा। पता है तेरी वजह से उसको अलग कर दिया जायेगा।  किया तुम यही चाह्ती हो कि उसको उसके कबीले और परिवार से अलग कर दिया जाये। कया यही तुम्हारा प्यार है? अपने लोगों में वपस जाओ।”

वो कया कर सकती थी।  शायद कुछ भी  नहीं। उसके मन में एक विचार आता है मेरा तो अब कुछ बचा नहीं है। चलो उसको बचाते है जिसको हम बेपनाह मुहबत करते है।  शायद दीदी ठीक कह रही है। मैं  मुस्लिम नहीं हूं। मुझे घर वापस जाना चाहिए।  पर किसके पास वापस जाऊँ। कोई भी तो अपना नहीं है।

इसलिए दरवाज़ा खटकाने से पहले वो सोचती है, “माँ ठीक कहती थी जब भी तुम्हारा दिल करे घर वापस आ जाना। तुम्हारे लिए  घर का दरवाज़ा हमेशा के लिया खुला रहेगा। फिर उसको अचानक याद आया माँ को तो गुज़रे हुए एक जमाना बीत गया है। घर का दरवाज़ा कोई और अब नहीं खोलेगा।

उसके कानो में यह आवाज़ गूंजती है,”मुन्ना, तुम अनाथ हो. समझ क्यूँ नहीं जाती यह समाज सिर्फ उन लोगो का जिस के पास power और पैसा। तुम को याद है माँ ने कया कहा था।  इस समाज से लड़ने के लिए तुम को ताकतों की जररूत है : Power और money . मैं सिर्फ तुम को मनी दे सकती हूं पर manpower  नहीं।  इसलिए तुमको यहां से जाना चहियाँ”

उसके दिमाग़ में आता है  कि दीदी ने तो कहा था कि अपने लोगो के पास जाओ।  पर अपने लोगों के दरवाज़े तो उस के लिए बन्द है। अचानक उसके दिमाग़ में एक ख्याल आता है ,”यह संसार तो मतलबी है। कोई अपना नहीं है। इसी को तो लोग कलयुग कहते है। वो खिड़की के पास जाती है। और सभी पर्दों गिरा देती है। उसको यह समझ  नहीं आती के वो अपने आप को अपनी ही रूह से छुपा रही यां फिर सच से। उसको यह भी नहीं समझ नहीं आ रहा कि वो खुद भी सच्च से डर रही है। वो फ़ोन से सभी इनफार्मेशन delete  कर देती है।

अपने आप को झूठी तसल्ली देती है ,”मैं अच्छा इन्सान नहीं हूं। बुरे लोगों को कोई भी पनाह नहीं देता है।  सच बोलना गुनाह है। प्यार तो सिर्फ एक अक्षर है जिसका मतलब तो बहुत complicated पर उसकी समझ किसी जोहरी को ही आती है।हर कोई चढ़ते हुए सूर्य को सलाम करता है , मैं तो डूब और बूझ चूका हुए वो चिराग़ हूं जिसकी कोई कीमत नहीं।”

उसका उदास मन और उदास हो जाता है और उसकी आँखों में से बारिश होने लगती है। उसको खुद को नहीं पता कि यह तोफान कितना गहरा है। अगर उसको पता होता के तूफान कितना ग़हरा तो वो दूसरों को चौकना कर देती उसको तो खुद को एल्म नहीं था। कहते है कि प्यार को तो सिर्फ महसूस किया जाता है। किसी को कहा नहीं जाता है। अन्त में वह फिर से अपने safe house में वापस आ जाती है। पर्दों को अच्छी तरह से बंद करती है। उसका दर्द यां तो फिर वो खुद जानती या फिर उसका खुदा। लेकिन ना तो अब उसकl घर है न ही घाट है। न तो उसका कोई धर्म है न ही उसका कोई अपना। उसके पास सिर्फ उसका ज़मीर है। उसके पास उसकी एक सच्च की आवाज़ है। यही कारन है वो अभी भी जिन्दा है उसको अपने वली पर भरोसा है एक दिन उसको इन्साफ मिलेगा। एक दिन ऐसा भी आयेगा जब सच्च की जीत और झूठ की पराजय होगी। कोई तो ऐसा इन्सान इस दुनियाँ में होगा जिसमें सच्च बोलने के साथ साथ उसमें कर्म करने भी कुशलता वी होगी। 

वह पूरी ताकत से दरवाजा खटखटाती रहती है। लेकिन यह उसकी ताकत की बात नहीं है; इसके बजाय, यह उस व्यक्ति की बात की ताकत है जो दरवाजा खोलेगा।

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