एक अजीब सी सजा

एक छोटी लड़की एक ऐसी जगह पर रहती थी जहाँ महानगरीय शहर की सीमाएँ समाप्त हो जाती थी और छोटे एक छोटे उपनगरीय की शुरुआत होती थी। नहीं, वो अकेली नहीं रहती थी। वो अपनी माँ और चाचा के साथ रहती थी। लोग कहते थे कि वोह लोग एक सुन्दर पहाड़ी से आकर यहाँ रहने लगे था। कोई नहीं जानता था कि वो सुन्दर घाटी को छोड़ यहाँ पर आकर क्यों रहने लगे थे।

लड़की की माँ खुश थी कि उसके भाई और भाभी कुछ दूरी पे रहते थे अब उसको अपने परिवार से मिलने के लिए सालों इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। उसके चाचा खुश थे कि उसको घर में अकेला नहीं रहना पड़ेगा। उसको इस बात की भी खुशी थी कि वो अपनी प्यारी सी भतीजी के साथ अधिक समय बतीत करेगा। पर छोटी सी वो लड़की खुश नहीं थी। कारण स्पष्ट था ना तो उसको सेब के पेड़ दिखई देते थे ना कोई पहाड़ दिखाई देता था। ना ही उसको अपनी खूबसूरत सी घाटी दिखाई देती थी। जब बड़े लोग कोई फैसला करते है तो बच्चों की कौन परवाह करता है।

छोटी लड़की का नाम मुन्ना था जिसका अर्थ है एक छोटा बच्चा। वो अब छह साल की बच्ची थी। उसके काले घुंघराले और गहरे भूरे रंग की त्वचा उसकी पहचान थी। उस को अपनी माँ से बहुत प्यार था। पर माँ से अधिक उसको अपने चाचू से प्यार थे। अक्सर वो अपने चाचू को दाड़ी वाली माँ कहती थी। सभी उसको बहुत प्यार करते थे। इसका मतलब यह नहीं था कि वो अपने पिता जी को भूल गई थी। जब भी वो आसमान के तरफ़ देखती थी तो एक ही ख्याल उसके मन में आता था कि उसके पिता जी रूस से सिर्फ उसको मिलने आयेगे।

माँ और बेटी में बहुत प्यार था। वो सारा दिन गली के बच्चो के साथ गुजारती थी कहते है कि छोटी बच्ची बहुत नादान थी पर उससे अधिक वो नटखट थी। उसको नींद नहीं आती थी जब तक वो कोई शरारत नहीं करती थी। माँ को अपनी बेटी पर बहुत विश्वास था। हर माँ की तरह उसको अपनी बच्ची पर नाज़ था। बच्ची भी अपनी माँ से बहुत प्यार करती थी। वो छोटी थी पर उसको पता था कि माँ को दर्द नहीं देते। चाचू कहते थे कि माँ और बाप के पैरो में स्वर्ग है। इस लिया वो अपने माँ और बाप दोनों के पैर छुआ करती थी। वो 16 तक की उम्र में भी अपनी माँ के साथ सोया करती थी। ऐसा नहीं था कि उसको रात को डर लगता था। नहीं, उसको अपनी माँ की खुशबू अछि लगती थी।

अगर माँ के पैरों में जनत है तो उसकी बगल में सोना सब से सुरक्षित था। बच्ची बीमार पड़ जाती तो माँ दिन रात उसके सरहाने बैठ कर पाठ किया करती थी। फिर ऐसा क्या हुआ था कि दोनों के बीच एक ख़ामोशी की दीवार खड़ी हो गई। ख़ामोशी की दीवार ने सभी कुछ बदल दिया पर एक चीज़ कभी नहीं बदली। दोनों में दूरी भी बहुत थी। ना तो माँ अपनी जिम्मेवारी से कभी पीछे हटी और ना ही बेटी। समय के साथ साथ दूरी भी बढ़ती चली गई।

लोग कहते है इस दूरी का कारण भी अज़ीब सा था। अपनों का लालच और और उनकी असुरक्षा की भावना ने माँ और बेटी को मिलने का कभी मौका ही ना दिया। यह भी सुना है कि माँ ने अपने परिवर की परंपराओं को रखने के लिया अपनी बेटी की उस चीज़ को हमेशा के लिया अलग कर दिया था जिससे उस छोटी सी बच्ची को बहुत प्यार था। और बच्ची ने माँ से उसकी सबसे अच्छी चीज़ से अलग कर दिया था। माँ की कमजोरी और प्यार कोई और नहीं था बल्कि वो छोटी बच्ची थी। उस दूरी को ख़तम किया उस इंसान ने जिसे वो लड़की सच्चा और बेइन्तहां प्यार करती थी। गजब की कहानी थी यह। प्यार चुराने वाले से उसकी ही प्यारी सी चीज़ को अलग कर दिया। माँ को इस बात का अहसास हुआ जब वो अन्तिम सांस ले रही थी।

वक्त और गुज़र गया था लड़की से उसके प्यार से फिर से अलग कर दिया गया। और लड़की ने फिर वही किया। अपने ही प्यार से उसकी सब से प्यारी चीज़ को उससे अलग कर दिया। इस बार थोड़ा सा फर्क है क्योंकि के किसी को पता ही नहीं कि उसने कया खो दिया। पता नहीं यह उस लड़की की किस्मत है या फिर उस का प्यार चुराने वाले की सजा। अगर मानो कि मरने का बाद फैसले का दिन का कोई नहीं। तो फिर सर्वशक्तिमान ने उसको सज़ा ए मौत इसी जन्म दे दिया है। पर यह भी किसी इन्सान की आत्मा पे निर्भर करता है। अगर वो इंसान नहीं सिर्फ शैतान है उसको तो फिर खुदा ही जाने। ना तो अब उस लड़की के पास बेइन्तहां प्यार करने वाला है और ना उसके पास कोई दूसरा रास्ता है। कहते है कि कहानी खतम नहीं हुई बल्कि अभी शरू हुई है.

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