बचपन की कुछ यादें

उतरी भारत में गर्मी का समय हर एक लिए नहीं है. इन दिनों में यहां बहुत गर्मी पड़ती है। स्थानीय लोगो के लिए इतना कठिन नहीं होता पर बाहर के लोगो के लिया यह इतना आसान भी नहीं है । युवा लड़की के सहपाठी जो शहर में रहते थे वो कभी कभी उसको मिलने के लिए आया करते थे। शायद शहर की जिंदगी से उकता कर वो खुली हवा में साँस लेने आते थे। उसके दोस्त भी कोई आम लोग नहीं हुआ करते थे। उसकी माता हमेशा कहती थी कि दोस्ती और दुश्मनी सिर्फ बराबर के लोगो के साथ ही करनी चाइये। उसको अपनी मां की कही बात का अर्थ उस समय तो समझ में नहीं आया था । जब उसकी समझ में आया तो बहुत देर हो चुकी थी।

उसके सभी जमाती हिन्दू थे। किसी का बाप बिजनेसमैन था या फिर कोई बड़ा सरकारीअफसर, या फिर किसी नेता की औलाद. लड़की का पिता भी तो बड़ा सरकारीऑफिसर था। कोई भी उसके पिता को नहीं जानता था। पर उसके चाचू को तो सभी जानते थे। इसलिए उनको पूरा यक़ीन था कि उनके बच्चे एक सिख परिवार् में महफूज़ होंगे।
उस दिन भी सभी दोस्त लड़की को मिलने के लिए उसके घर गए थे जो शहर से बाहर था। लड़की की माँ को मिलकर वो उसके फार्महाउस के लिया चलने ही वाले थे। वो साइकिलो पर चढ़ने ही वाले थे जब लड़की के चचेरे भाई ने साथ जाने की ठान ली। पर वो उसको साथ नहीं लजाना चाहती थी। लड़की ने अपने चचेरे भाई को बोला कहा, ” क़्या आप घर में रह सकते है। यह मेरे सहपाठी दोस्त हैं, इसलिए आपको मेरा दिन बर्बाद करने का कोई व्यवसाय नहीं। इसलिए किर्पा करके हमारा दिन मत बर्बाद करो।”

लेकिन उसके चचेरे भाई के कान पर कोई जु नहीं सरकी। वो लगातार उसके पीछे अपनी साइकिल चलाता रहा।
कुछ दूरी पर एक सोल्जर पहरे पर तैनात था। दूरबीन के पीछे उसकी दो आँखें ने अचानक लड़की और उसको दोस्तों को देखा और अपने मन में कहा , “यह माँ बाप की बिगड़ी हुई औलाद दोपहर में अपने दोस्तों के साथ कहाँ जा रही है। इनसे कोई अच्छी उम्मीद नहीं की सकती है? इसकी माँ सही कहती है कि यह लड़की कभी कुछ नहीं सीखेगी। “
सिपाही को लगा कि कुछ सही नहीं है, इसलिए वह अपने श्रेष्ठ अधिकारी को सूचित करने के लिए अंदर गया, “साहब, शायद आप उस तूफानी लड़की को मौत से रोक सकते हैं।”

कमांडर ने दूरबीन को सैनिक से पकड़ा और देखा कि और लड़की फार्महाउस के बीच में बनी पगडण्डी से अपने दोस्तों के साथ फार्महाउस की तरफ या रही है उसके पीछे उसका चचेरा भाई और कुछ अज्ञात बच्चे भी साइकिलो में जा रहे थे। कमांडर ने सैनिक से कहा, “कोई बात नहीं जाने दो उनको। एक के घुटने टूटे यह अपने आप वापस आ जाएगे। थोड़ी देर के लिए वातावरण भी शांत हो जाएगा । उनको करने दो जो वे करना चाहते हैं। उनके माता-पिता परवाह नहीं करते, तो मुझे क्यों इनकी परवाह करनी चाहिए? बस नज़र रखो इनपर। ” यह कहते हुए कमांडर फिर अंदर चला गया।

खेत में गेहूँ की फसल पक कर तैयार थी ऐसा लग रहा था जैसे एक सुनहरे कंबल ने धरती को पूरी तरह से ढक लिया हो। ठंडे इलाके में पला बड़ा कमांडर इस प्रकार के मौसम के लिए नहीं बना था । उसे गर्मी से नफरत थी। अक्सर वो कहा करता था, “अगर मैं गर्मी से मर जाता हूं तो यह शर्म की बात होगी।”

लोग कहते हैं कि कमजोरी इंसान को एक दिन मार लेती है यह कमजोरी इंसान के अंदर एक हथियार बन कर रहती है और वक्त आने पर इंसान को अंदर से ही खत्म कर देती है। यह कमज़ोरी इंसान को मौत की तरफ ले जाती है. आस्चर्य्रा की बात है कि इंसान इस कमज़ोरी को जानते हुआ भी अन्धा हो जाता है। लोग कहते थे कि कमांडर की एक नहीं बल्कि दो कमजोरियां थी। उसकी एक कमजोरी थी वो पागल सी लड़की और उसकी दूसरी कमज़ोरी थी उसके शिकार करने की आदत। वो एक ऐसा शिकारी था जो छुप कर अपने शिकार का इंतज़ार नहीं करता था बल्के वो शिकार के पास जाता था।
अपनी आदत से मज़बूर, कमांडर फिर बाहर आया और उसने सिपाही से कहा, “ठीक है, मैं बच्चों को देखता हू। बस सतर्क रहें। कोई समस्या हो तो रेडियो के जरिए सम्पर्क करना। ”

कमांडर के बहुत सारे स्थानीय मुकबार थे जिसके जरिए उसको पता चला था कि लड़की का चचेरा भाई जल्दी ही किसी मुश्किल में आ सकता है। इस तरह कमांडर की कमज़ोरी और उसके जनून ने अपना काम किए।
उसने फसलों के माध्यम से चलना शुरू कर दिया, जबकि बाकी टीम ने भी उनके पैरों के निशान का पालन किया। अचानक अधिकारी ने सुना, “साहब, जिप्सी कार संदिग्ध लोगों से भरी हुई है, बच्चों के समान दिशा की और जा रही है।”
यह एक तीन तरफ की रेस थी। एक तरफ बच्चे जो खतरे से बेख़बर सबसे पहले फार्महाउस पर जाना चाहते थे। दूसरी दोड़ में शामिल थे आंतकवादी जो अपने आप को धर्म के ठेकेदार समज़ते थे। तीसरी दौड़ में सेना के सिपाही शामिल थे यो अपनी ड्यूटी करने के लिए दौड़ लगा रहे थे। उस वक्त तो सिर्फ खुदा ही जनता था कि इन तीन टीम्स में से कौन विजेता होगा।

जब बच्चे फार्महाउस की ओर जाने वाले छोटे रास्ते पर तेज़ी से बाइक चला रहे थे। दूसरी तरफ सैनिक फसलों के माथ्यम से दौड़ रहे थे । तीसरी तरफ थे वो बुरे लोग यो बच्चों की दिशा में जा रहे थे। तीन अलग अलग तरह की दौड़े एक ही दिशा में लग रही थी पर किसी को नहीं पता था कि कौन पहले इस दौड़ को जीतेगा।

कमांडर ध्यान से फसल के माध्यम से भाग रहा था, लेकिन उसका मस्तिष्क व्यस्त था। उन संदिग्ध लोगों का निशाना कौन बनेगा? बाइक पर बच्चे शहर के प्रभावशाली परिवारों के थे। क्या वे मेयर की भतीजी और भतीजे, या एक स्थानीय राजनेता के बेटे, या एक हिंदू व्यापारी के बेटे को निशाना बनाएंगे? कया वो एक हिंदू लड़की को यो कॉलेज के प्रोफेसर की बेटी उसको अपना निशाना बनाऊंगो ? हो सकता वो मायेर के बच्चो और नेता के बच्चो को कोई नुकसान न करे क्योंकि वे एक ही धार्मिक समूह के हैं। उनका निशाना हिंदू बच्चे हो सकते हैं। अगर उन्हें नुकसान पहुंचाया गया। या उनका अपहरण किया गया, तो कस्बे में अराजकता होगी। सैन्य क्षेत्र होने के नाते, शहर का यह हिस्सा अब तक तो सुरक्षित था।
कमाण्डर जितनी जल्दी चल रहा था उससे कही अधिक स्पीड में उसका दिमाग चल रहा था।

इस दौड़ में विजय तो बच्चो की हुई। पर कया यह जल्दी नहीं कि बच्चो को विजेता का ईनाम दिया जाए। बच्चों ने फार्महाउस पर रुककर ताजे फल और सब्जियों का आनंद भी लेना शुरू कर दिया। लेकिन सेना और आंतकवादी अभी भी दौड़ लगा रहे थे। हैरानगी की बात तो यह थी कि इन में से सिर्क एक टीम को ही पता था कि यह पर जिंदगी की असली रेस लग रही है।

वायरलेस मैन ने सैनिकों को सूचित किया कि संदिग्ध वाहन फार्महाउस की ओर बढ़ गया है। जो सैनिकों के लिए बहुत अच्छी खबर नहीं थी। हालांकि, प्रशिक्षित सैनिक पहले बच्चों के पास पहुंचे और कमांडर ने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा, “अपने आप को खेत में छिपाओ।”

बच्चों को खेतों में छुपाने के बाद, सैनिकों ने अपनी पोजीशन ली। अचानक दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर गोली चलानी शुरू कर दी। लड़की और उसके चचेरे भाई को पता था कि खेतों के माध्यम से वोह अपने घर के पिछवाड़े में पहुंच सकते है। बच्चों को यह भी पता था कि मुख्य सड़क तक कैसे पहुंचा जाए लेकिन उनको यक़ीन नहीं था कि वो में सड़क पर सुरक्षित होंगे जा नहीं ।

बच्चे सुरक्षित घर पहुंच गए। परंतु लड़की और उसका चचेरा भाई युद्ध के मैदान में लौट आए। उनके मन में डर था लेकिन वो सैनिकों के बारे में भी चिंतित थे। दोनों पक्ष के लोग घायल हो गए। आंतकवादी अपने वाहनों में बैठकर भाग गए।

लड़ाई के अंत में, लड़की और उसके चचेरे भाई को दो बार समस्या का सामना करना पड़ा। पहले उनको सैनिकों का सामना करना पड़ा , उसके बाद अपने माता-पिता का । यह वह दिन था जब उसके परिवार ने फैसला किया था कि जब तक सब कुछ नियंत्रण में नहीं होगा तब तक उसका कोई भी हिंदू दोस्त उससे मिलने नहीं आएगा। उसकी माँ ने कहा, “यह तुम्हारे दोस्तों की सुरक्षा के लिया है। तुम्हारे दोस्त शहर के उस तरफ सुरक्षित हैं क्यांके जहाँ बहुसंख्यक आबादी हिंदू लोगो की है। कोई भी नहीं चाहता कि बुरे लोग आपके मित्रो को कोई नुकसान पहुँचाएँ। क्या आप समझ रही हो जो मैंने अभी कहा है ? यह आपके और आपके दोस्तों की सिक्योरिटी के लिया है । ”

लड़की समझ नहीं पा रही थी कि दूसरे धर्म के उसके दोस्त उससे मिलने क्यों नहीं आ सकते। वे मेरे फार्महाउस में क्यों नहीं खेल सकते। हम खेलना चाहते हैं। हम सिर्फ बच्चे हैं। कोई मेरे दोस्तों को नुकसान क्यों पहुंचाना चाहता है। क्या मेरा रंग अनु के रंग से अलग है? अनु के छोटे बाल है तो मेरे बाल भी तो छोटे है । बीनू के छोटे बाल हैं। वे कैसे पहचानेंगे कि हम में से कौन सा हिन्दू और कौन ईसाई है। साइबल भैया ईसाई है.

लड़की के पास कई सवाल थे, लेकिन उनमें से किसी के पास उसके लिए कोई जवाब नहीं था । हमेशा की तरह, हर किसी ने लड़की को नजरअंदाज कर दिया था क्योंकि वह हमेशा सवाल पूछने की जिज्ञासा रखती थी। उनमें से किसी ने यह नहीं सोचा था कि उसके मासूम दिमाग पर इस का कितना असर पड़ा था।बाद में, उनके किसी भी हिंदू मित्र ने उनके फार्महाउस का दौरा नहीं किया था । हालाँकि, जब भी कभी कर्फ्यू लगता था, उसकी माँ ने हमेशा उनको सब्जियाँ, दूध, और एक अन्य घरेलू चीज़ भेजी थी। माँ कहा करती थी , “यह तो सिर्फ भगवान जानता है कि वो घर के अंदर कैसे अपना बचा करेगे और क्या खाते होंगे।”

कुछ वर्ष बाद वो लड़की देश छोड़कर चली गई। कुछ साल बाद, कहते है कि उसके शहर में आतंकवाद पूरी तरह से समाप्त हो गया था । उसके अधिकांश हिंदू दोस्त उसकी माँ से मुलाकात करने आया करते थे । वे अक्सर पूछते थे कि वो देश कब लौटेगी। उसकी माँ कहती थी , “उसके बारे में तो सिर्फ अब भगवान् ही जानता है।” सुना है अनु, संजू, परवीन, थापा, साइबल भैया और सुनील ने आखिरकार अपनी मंजिल को चुन लिए । वोह उसकी माँ के संपर्क में तब तक रहे जब तक वो जिन्दा रही। लेकिन उस छोटी सी लड़की ने अपनी माँ और किसी और के साथ कभी भी संपर्क नहीं किया। उसकी माँ के मरने से पहले लड़की अपनी माँ से मिली थी पर उसके वो दोस्त उसको कभी भी नहीं मिल पाए।

अब वोह सोचती है उस दिन उन सब को बचाने वाला कोई और नहीं था बल्कि खुदा का बंदा , एक सच्चा मुस्लिम , उसका अपना अबू था। उस वकत वो कोई जेहादी नहीं नहीं था उस वकत वो एक मुस्लिम न था वोह सिर्फ एक इंसान था देश का सिपाही था। फ़र्क सिर्क इतना है वो कश्मीर की घाटी से बाहर था।

One thought on “बचपन की कुछ यादें

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s